छठ पूजा क्यों की जाती है : क्या है छठ पूजा महत्व जाने इसके बारे में ?

छठ पूजा : आज हम बताने वाले है छठ पूजा के बारे में जो की हिन्दुओ का त्यौहार जैसे पांच दिनों तक ही नहीं चलता यह छठ तक चलता है |विशेष रूप से इसे उत्तर प्रदेश और बिहार में मनाया जाता है |यह त्यौहार भी दिवाली की तरह धूमधाम से मनाया जाता है |यह त्य्हार भी पूरे चार दिनों तक चलता है |इसमें अलग विधि होती है नही खाय से लेकर भगवान सूर्य को अर्घ देने तक की प्रक्रिया चलती है |इसका अपना ही प्राचीन महत्त्व है |

छठ पूजा का इतिहास

आपको बता दे छठ पूजा कैसे शुरू हुआ इसके पीछे कई इतिहास की कई कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन पुराणों के अनुसार छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। ऐसा कहते है राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी |तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी।  उन्हें पुत्र की प्राप्ति तो हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ था । प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में वह अपने प्राण त्यागने लगे। तभी भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं | उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं | इसी कारण वो षष्ठी माता कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।

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छठ पूजा की कथाए

फिर राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं | ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी |और तभी से छठ पूजा होती है। इसके अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है। जो  पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।

महाभारत से जुडी कथाए

धर्मं शास्त्रों के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। इसकी शुरुआत सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त में से थे |और वो रोज घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते और उनकी आराधना करते थे।

सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है। आपको बता दे छठ पर्व के बारे में एक कथा प्रचलित है। इस कथा के मुताबिक जब पांडव अपना सारा राजपाठ जुए में हार गए तब दौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया। लोक परंपरा के मुताबिक सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी होती है |

उत्सव का स्वरूप

आपका बता दे की छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। ऐसे में व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं।और इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय

छठ पर्व का पहला दिन जिसे ‘नहाय-खाय’ के नाम से जाना जाता है |सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है।उसके बाद व्रती अपने नजदीक में स्थित गंगा नदी,गंगा की सहायक नदी या तालाब में जाकर स्नान करते है।घर लौटते समय वो अपने साथ गंगाजल लेकर आते है जिसका उपयोग वे खाना बनाने में करते है । वे अपने घर के आस पास को साफ सुथरा रखते है । व्रती इस दिन सिर्फ एक बार ही खाना खाते है ।

खाना में व्रती कद्दू की सब्जी ,मुंग चना दाल, चावल का उपयोग करते है | तली हुई पूरियाँ पराठे सब्जियाँ आदि ये वर्जित हैं | यह खाना कांसे या मिटटी के बर्तन में पकाया जाता है। खाना पकाने के लिए आम की लकड़ी और मिटटी के चूल्हे का इस्तेमाल किया जाता है। जब खाना बन जाता है तो सर्वप्रथम व्रती खाना खाते है | उसके बाद ही परिवार के अन्य सदस्य खाना खाते है ।

खरना और लोहंडा

छठ पर्व का दूसरा दिन खरना के नाम से जानते है | इस दिन व्रती अन्न नहीं लेता | सूर्यास्त से पहले पानी तक ग्रहण नहीं करते है। और शाम को चावल गुड़ और गन्ने के रस का प्रयोग कर खीर बनाया जाता है।खाने ने नमक और चीनी का प्रयोग नहीं किया जाता है। इन्हीं दो चीजों को पुन: सूर्यदेव को नैवैद्य देकर उसी घर में ‘एकान्त’ करते हैं |अर्थात् एकान्त रहकर उसे ग्रहण करते हैं। परिवार के सभी सदस्य उस समय घर से बाहर चले जाते हैं ताकी कोई शोर न हो सके। एकान्त से खाते समय व्रती हेतु किसी तरह की आवाज सुनना पर्व के नियमों के विरुद्ध है।

इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को ‘खरना’ कहते हैं। चावल का पिठ्ठा व घी लगी रोटी भी प्रसाद के रूप में वितरीत की जाती है।मध्य रात्रि को व्रती छठ पूजा के लिए विशेष प्रसाद ठेकुआ बनाती है ।

संध्या अर्घ्य

छठ पर्व का तीसरा दिन जिसे संध्या अर्घ्य के नाम से जाना जाता है | पुरे दिन सभी लोग मिलकर पूजा की तैयारिया करते है।वहां पूजा अर्चना करने के बाद शाम को एक सूप में नारियल,पांच प्रकार के फल,और पूजा का अन्य सामान लेकर दउरा में रख कर घर का पुरुष अपने हाथो से उठाकर छठ घाट पर ले जाता है। यह अपवित्र न हो इसलिए इसे सर के ऊपर की तरफ रखते है।

छठ घाट की तरफ जाते हुए रास्ते में प्रायः महिलाये छठ का गीत गाते हुए जाती है |नदी या तालाब के किनारे जाकर महिलाये घर के किसी सदस्य द्वारा बनाये गए चबूतरे पर बैठती है। सूर्यास्त से कुछ समय पहले सूर्य देव की पूजा का सारा सामान लेकर घुटने भर पानी में जाकर खड़े हो जाते है और डूबते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देकर पांच बार परिक्रमा करते है।

उषा अर्घ्य

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है |सूर्योदय से पहले ही व्रती लोग घाट पर उगते सूर्यदेव की पूजा हेतु पहुंच जाते हैं और शाम की ही तरह उनके पुरजन-परिजन उपस्थित रहते हैं। संध्या अर्घ्य में अर्पित पकवानों को नए पकवानों से प्रतिस्थापित कर दिया जाता है परन्तु कन्द, मूल, फलादि वही रहते हैं। सभी नियम-विधान सांध्य अर्घ्य की तरह ही होते हैं। सिर्फ व्रती लोग इस समय पूरब की ओर मुंहकर पानी में खड़े होते हैं व सूर्योपासना करते हैं।

घर वापस आकर गाँव के पीपल के पेड़ जिसको ब्रह्म बाबा कहते हैं वहाँ जाकर पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना कहते हैं। व्रती लोग खरना दिन से आज तक निर्जला उपवासोपरान्त आज सुबह ही नमकयुक्त भोजन करते हैं |

छठ पूजा के महत्त्व

छठ पूजा का महत्व बहुत अधिक‌ माना जाता है। ऐसे में श्रद्धालु छठ व्रत सूर्य देव, उषा, प्रकृति, जल और वायु को समर्पित हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से नि:संतान स्त्रियों को संतान सुख की प्राप्ति होती हैं।

कहते है कि छठ व्रत संतान की रक्षा और उनकी जिंदगी में तरक्की और खुशहाली लाने के लिए किया जाता है। विद्वानों का मानना है कि सच्चे मन‌ से छठ व्रत रखने से इस व्रत का सैकड़ों यज्ञ करने से भी ज्यादा पुन प्राप्त होता है। कई लोग केवल संतान ही नहीं बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि के लिए भी यह व्रत और पूजा रखते हैं।

छठ पूजा के फायदे

  1. जिस तरह पौधों के लिए जल के अलावा सूर्य के प्रकाश की भी जरूरत होती है उसी तरह मनुष्य के जीवन के लिए भी सूर्य के प्रकाश या धूप की अत्यंत ही आवश्यकता होती है।
  2. आपको बता दे की सूरज की रौशनी से आंखों में लाभ मिलता है | पेट से सम्बंधित समस्या भी समाप्त हो जाती है |
  3. सुबह के समय सूर्य को जल चढ़ाते समय इन किरणों के प्रभाव से रंग संतुलित हो जाते हैं | और साथ में शरीर में रोगप्रतिरोधात्मक शक्ति बढ़ती है।
  4. आपको बता दे जिन लोगों की कुंडली में सूर्य कमजोर होता है | उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है और वे निराशावादी हो जाते हैं। इसमे उन्हें सूर्य की आराधना करनी चाहिए |
  5. प्रात:काल सूर्य देव के दर्शन से शरीर में स्फूर्ति आती है | और हमारे शरीर अच्छा महसूस करेगा तो मन भी सकारात्मक भाव आते है |

शास्त्रों के अनुसार लाभ 

  1. शास्त्रों में कहा गया है  सूर्य देव को अर्घ्य देने से वे बहुत जल्दी भगवान् जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं। और अपने भक्त के जीवन को अंधकार से निकालकर प्रकाश ज्ञान तक  ले जाने का मार्ग प्रशस्त करते है |
  2. मान्यता अनुसार सूर्य को अर्घ्य देने से घर-परिवार में मान-सम्मान और सभी प्रकार के वास्तु दोष ख़तम होते है।
  3. सूर्य को प्रतिदिन अर्घ्य देने से व्यक्ति कुंडली में सूर्य की स्थिति भी मजबूत होती है |
  4. जैसे एक पौधों को अपने जीवन के लिए  जल के अलावा सूर्य के प्रकाश की जरूरत होती है | ठीक ऐसे ही मनुष्य के जीवन के लिए भी सूर्य के प्रकाश अत्यंत ही आवश्यकता होती है।
  5. सूर्य प्रकाश का उर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है |और हमारे धर्मं  में प्रकाश को सनातन धर्म में सकारात्मक उर्जा का प्रतीक माना गया है।

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छठ पूजा क्यों की जाती है– आज हमने बताया की दिवाली के बाद भी छठ पूजा का एक बड़ा त्यौहार के बारे में जो बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है | |या चार दिन के इस व्रत को लोग बड़ी ही श्रद्धा के साथ रखते है |मताए इसे अपनी संतान की लम्बी आयु और सुख समृधि के लिए इस व्रत को रखती है | आपको ये हमारा आर्टिकल पसंद आया है तो अपने दोस्तों के साथ शेयर ज़रूर करे और लिखे करे |और कमेंट करके बताये|